“प्यार की डिफिनेशन”

जब पूछा हमने उस से प्यार की डेफिनेशन।
बोला वो केअर करो इतना कि लग जाये डिक्टेशन।

यही तो है बस प्यार की डेफिनेशन।

जब बारी आई उसकी, क्यो भूल गया डेफिनेशन।

जब प्यार ही नही तुम्हें मुझसे तो क्यों किया अपने दिल का दिखावे के लिए करेकशन

वाह रे तुम और तुम्हरे प्यार की डेफिनेशन।
सच्ची कहु तो फेका है तूमने।
मेरे दिल को नोचा है तुमनें।

बस तुम्हे केवल खुद की
फिकर क्यो।
क्यो नही तुमको
नज़र आती है, तुम्हें मेरी बेबसी।
बोला जो -जो तुमने ,सब एक एक कर के मुकर रहे।
मेरे प्यार की भावनाओं को क्यो पैरो तले कुचल रहे।


सुख दुख के साथी का वादा।

अब क्यो बस दुख ही दुख देते। तुम्हे एक चिर गर लग जाएं, कलेजा फट मेरा जाता। क्यो मेरे खून के आंसू देख के भी तुम्हरा दिल तनिक भी नही घबराता।

अगर तुम्हरे पास दिल नही ,तो इंसान नियत का ही रिस्ता निभा जाते,

मेरे गिरते हुए आंसू को अपने हाथों से हटा जाते।
क्या समझ लू मैं की मेरे आंसू देख देख के पत्थर बन बैठे हो ।
वो भी सिर्फ मेरे लिए
प्यार की डेफिनेशन बताने वाले इंसान बस एक उलझन मेरी समझा जाओ।
अपने दिल से निकल सकु मैं तुम्हे भी ऐसे कोई तरकीब सूझा जाओ


‘यू ही नहीं’

यू ही नही मरती आपके लिए मैं
आज पता चला मुझे
आपकी आवाज मुझपे मरहम जैसे काम करती है।
आपका कुछ ही पल बातें करना
पूरे चौबीस घण्टे को संभालता है।
[यू ही नही ,,,,,,,,,

आपको पता नही है शायद आपकी ये छोटी सी मुस्कुराहट जिसपे मैं मर मिट जाउ। जन्नत से भी ज्यादे खूबसूरत है।

यू ही नहीं मरती मैं आपके लिए……
जागती आँखों से देखती रहती हूँ सपने बस आपके ही।।
इस चाहत भरे दिल मे रहेंगे सदा आप ही
पल भर के लिए कुछ पल निकाल
सोचना कभी आप भी।
आपकी चाहत के बगैर अबतर हो जाएगी मेरी ज़िंदगी।(sa)

‘गुलबदन तो नही’….

मैं गुलबदन तो नही,
लेकिन तुम्हे गुलसन में बिठा
के रखूँगी।


तुम्हारे हर ख्वाब को,
अपने ख्वाबो में मिला
के रखूँगी।


मैं गुलबदन तो नही……….।

मैं हूं तो गैर, मगर तुम्हे अपना बना के रखूँगी।

तुम्हारे एक -एक पल को खुशियों के रंग में लगा के रखूँगी।

मैं गुलबदन तो नही.........।

मैं गा तो नही सकती शायद,पर तुझे अपना गजल। बना के रखूँगी।

कोना-कोना तेरे रोम का सुरो से सजा के रखूँगी।

गुमसुम जरूर हूँ मगर, तुम्हारे जीवन को संगीत में मिला के रखूँगी।

मैं गुलबदन तो नही..............

इतना इख्तियार तो नही मेरा कि सारे गम से दूर रख पाउ तुमको ।

पर तुम्हारे सारे गम को तुम तक पहुचने से पहले, अपनी बाहें फैला के रखूँगी।

मैं गुलबदन तो नही............

ऐसे कोई अदा तो नही की तू मेरी ओर खींचा चला आये।

मेरी सांसो की डोरी में बंधा जाये।

पर तुम्हे अपने दिल के मंदिर में। हमेशा बैठा के रखूँगी।

मैं गुलबदन तो नही...........

खुदा न करे कभी,अगर पूरी दुनिया तुमसे कभी खफा हो जाये।


अपनी ज़िंदगी से दफा कर जाए।
मगर मैं हमेशा परछाई बन
तुम्हारे साथ रहूंगी।
मैं गुलबदन तो नही,

मगर तुम्हे गुलसन में बिठा के रखूँगी।♥️♥️


( जन्मदिन की असीम शुभकामनाये $/a)

{19 Sept 20} 11:31pm

‘सिर्फ लड़की हूँ’

झुकना आता है मुझे।
प्यार न मिलने पर भी प्यार करना आता है मुझे।
वो इसलिए
क्योकि मैं सिर्फ लड़की हूँ।

मानती हूँ तुम्हारे लिए अजीज नही हूँ मै।
फिर भी तुमको दिल मे बैठाया है।
अपनी सांसो में छुपाया है।
वो इसलिए क्योंकि मैं सिर्फ एक लड़की हूँ।

कुसूर है मेरा कि, मेरा

मुझे कोई ऐब नही दिखता तुझमे,

कुसूर है मेरा कि

तुम्हारी एक झलक पाने के लिए सारे कायदे भूल जाती हूं।

ये जानते हुए भी तुम मुझे दोषी ठहराते हो ।

क्योकि मैं सिर्फ एक लड़की हूँ।

कुसूर है मेरा कि तुम्हारी खैर जानने के लिए,
सारी बंदिशे तोड़ देती हूँ।

ये जानते हुए भी तुम
कहते हो कि मैं तुम्हरी तरह समर्थ नही हूँ।

कुसूर है मेरा कि तुम्हारी खैर जानने के लिए,
सारी बंदिशे तोड़ देती हूँ।

ये जानते हुए भी तुम
कहते हो कि मैं तुम्हरी तरह समर्थ नही हूँ।

पूछते हो न तुम मुझसे,
की क्या आता है तुम्हे?
तो जान लो

तुमहारे गुस्से को भी प्यार से सजना आता है मुझे।

क्या कम है ?

ये सब तुम्हारी ज़िन्दगी में आने के लिए?
जो कहते हो क्या है तुझमे अपना बनाने के लिये।

वो इसलिए न क्योकि मैं सिर्फ एक लड़की हूँ।

($)

‘अधूरे एहसास’

इन लम्हों मे मैं अधूरी हूँ,

पर सोच -सोच के उनको पूरी हो रही हूँ।

कुछ तो है एहसास,

जो बना जाता है मेरे पल -पल को खास।

इतना खास,इतना खास

कि अब न रही किसी और कि आस।

देखु जब भी आईना,

उनके चेहरे की इस्टतिसाम नज़र आती है।

भूल गयी हूँ खुद को,

बस चंद लम्हो का है साथ।

वो चाँद का टुकड़ा ,न जाने कब होगा मेरे पास?

उनकी शरारत भरी नज़रें,

मेरी नज़रो को मिलने नही देती।

कब मिलेगी नज़रें?कब पूरे होंगे वो अधूरे एहसास?

($8/7/2०)

“अजीब दास्ता”

हम कह नही पा रहे या

वो समझ नही पा रहे हैं।

अजीब दास्ता है उनकी,
हम पास हो रहे हैं वो महरूम किये जा रहे हैं,

लिखती तो खत रोज उनको ही हूँ
पर वो हमें लिखता देख
पढ़ना ही छोड़े जा रहे हैं।

अजीब दास्ता है उनकी।
हम उन्हें चाह रहे हैं वो हमें तड़पा रहे हैं।

कौन समझाये उनको की अगर हम कही छूट गए तो
फिर कहा हम मिलेंगे उनको

बदलता है आसमा रंग जैसे जैसे
वो बदले जा रहे हैं।
अजीब दास्ता है उनकी

हम कह नही पा रहे या वो समझ नही पा रहे हैं।

S (29/02/2020) 10:20pm

‘पिया’

छोड़ रही हूँ, बाबुल का अंगना,
है पिया के आंगन जो जाना।

हूँ मैं फूल बाबूल बगिया की
बन खुशबु पिया साथ निभाना

अगर बिखरने लगु मैं कभी
बन माली पिया मुझे जुटाना।

छोड़ रही हूँ बाबुल का अंगना।

हूँ मैं अम्मा की परछाई
जो अब हो रही परायी
जोड़ना पिया तुम मुझसे ऐसी सगाई।
जिसको कोई रीत कभी न कर सके परायी।

साँसे छूट जाए मेरी, पर पिया तुम साथ न छोड़ना।

छोड़ रही हूं बाबुल का अंगना।

हूँ मैं हँसी भईया आंगन की

जो अब हो रही साजन की

अगर ये हँसी कभी नम पड़ जाए।

बन मुस्कुराहट पिया ,तुम खिलखिलाना।

छोड़ रही हूँ बाबुल का अंगना।
है पिया के जो आंगन जाना।

My 2L..e s…..e.

आज जब मैं अपने भावनावो को कोरे सफहो पे कुरेदने बैठी हूँ, न जाने क्यो मेरे कलम की स्याही साथ न दे रही है। एक दिन था जब कभी मैं कुछ लिखने बैठती थी।मेरे कलम निरन्तर चलते रहते रुकने का नाम ही न लेते।

और आज चलने का न ले रहे।

आखिर फर्क क्या हो गया है आज और कल में

क्यो हो रही है आँखे निश्चल पल -पल में।

क्या मेरी ज़िन्दगी से सारे उद्देश्य ही ख़त्म या फिर जरूरत। (27/11/2019)

Arti Rai

‘लगाव से अलगाव’

जैसे ही हम आगे बढ़ने लगे ।
मेरे चेहरे की मुस्कुराहट अनयास ही गायब हो गयी।

मुझे याद आने लगी वो भीड़ -भाड़ में भी रोड आसानी से क्रॉस करना।

याद आने लगे वो पी -पी की आवाज़ जो हर वक़्त कानों में गूँजती रहती |

मुझे याद आने लगे वो रोड के आ कुत्ते जो रास्ते मे चलते वक़्त सामने आ जाते।

मुझे याद आने लगे वो सांड जो बीच रास्ते मे अक्सर चलते हुए मिल जाते थे जिसको देखकर अक्सर हमलोग बोलते की भोले बाबा घूम के अपनी नगरी का हाल चाल ले रहे हैं।

मुझे याद आने लगे वो ढेर सारे उलझे हुए बिजली के तार।

मुझे याद आने लगी मंदिर की भीड़।

मुझे याद आने लगी वो किलकारियां जो अक्सर हमारे रूम में गूंजती।

मुझे याद आने लगा था वो अपनापन जो अजनबियों के साथ हो गया था।

मुझे याद आने लगी वो आज़ादी जो शायद अब कभी न मिलती।

मुझे याद आने लगा मेरा पसिंदीदा मोमोज।

मुझे याद आने लगा वो तालाब ,जहाँ मुझे सबसे ज्यादे सुकून मिलता।

मुझे याद आने लगा वो भिखारियों का कारवां।

जैसे -जैसे औटो अपनी रफ्तार में बढ़ रहा था मेरी आँखें नम हो रही थीं ।
और मैं धिरे धीरे कैद हो रही थी,उस नज़रिये में।।।।।

जो मुझे अकेले बाजार तक जाने की आज़ादी नही देता।

मैं कैद हो रही थी उस नज़रिये में जो मेरे ट्राली बैग लेकर चलने में मुझे हीरोइन बन ने का तंज देता।

मैं कैद हो रही थी उस नज़रिये में जो मुझे साइड दुप्पटा नही लेने देता

मैं कैद हो रही थी उस नज़रिये में जिसको मेरे खुले बालो से परेशानी होती।

मैं कैद हो रही थी उस नज़रिये में जो मुझे किसी त्योहार प भी सजने सवरने की इजाजत नही देता।

मैं कैद हो रही थी उस नज़ीरिये मे जो मेरे andriod फ़ोन लेने पर ये तंज करता कि ”सुवरे सेनुर गिरगिटे माला।”
( मतलब मैं काबिल नही हु,खूबसूरत नही हूँ इसलिए बड़ा फ़ोन मेरे हाथ मे नही शोभता)

मैं कैद हो रही थी उस नज़ीरिये मे जो मुझे अपने चेहरे को धूल मिट्टी से बचाने की इजाजत तक नही देता।

मैं कैद हो रही थी उस नज़रिये में जहाँ लड़की की शादी स्नातक तक न कर पाने वाले बाप को ताना मारा जाता।

मैं कैद हो रही थी, मैं कैद हो रही थी।,,,,,,,,,,,,,,,
और मेरी नम आंखे आसुओं को समेट न पाए।

वो बारिश की बूदों की तरह बरसने लगे।(Arti Rai)