“अजीब दास्ता”

हम कह नही पा रहे या

वो समझ नही पा रहे हैं।

अजीब दास्ता है उनकी,
हम पास हो रहे हैं वो महरूम किये जा रहे हैं,

लिखती तो खत रोज उनको ही हूँ
पर वो हमें लिखता देख
पढ़ना ही छोड़े जा रहे हैं।

अजीब दास्ता है उनकी।
हम उन्हें चाह रहे हैं वो हमें तड़पा रहे हैं।

कौन समझाये उनको की अगर हम कही छूट गए तो
फिर कहा हम मिलेंगे उनको

बदलता है आसमा रंग जैसे जैसे
वो बदले जा रहे हैं।
अजीब दास्ता है उनकी

हम कह नही पा रहे या वो समझ नही पा रहे हैं।

S (29/02/2020) 10:20pm

‘पिया’

छोड़ रही हूँ, बाबुल का अंगना,
है पिया के आंगन जो जाना।

हूँ मैं फूल बाबूल बगिया की
बन खुशबु पिया साथ निभाना

अगर बिखरने लगु मैं कभी
बन माली पिया मुझे जुटाना।

छोड़ रही हूँ बाबुल का अंगना।

हूँ मैं अम्मा की परछाई
जो अब हो रही परायी
जोड़ना पिया तुम मुझसे ऐसी सगाई।
जिसको कोई रीत कभी न कर सके परायी।

साँसे छूट जाए मेरी, पर पिया तुम साथ न छोड़ना।

छोड़ रही हूं बाबुल का अंगना।

हूँ मैं हँसी भईया आंगन की

जो अब हो रही साजन की

अगर ये हँसी कभी नम पड़ जाए।

बन मुस्कुराहट पिया ,तुम खिलखिलाना।

छोड़ रही हूँ बाबुल का अंगना।
है पिया के जो आंगन जाना।

My 2L..e s…..e.

आज जब मैं अपने भावनावो को कोरे सफहो पे कुरेदने बैठी हूँ, न जाने क्यो मेरे कलम की स्याही साथ न दे रही है। एक दिन था जब कभी मैं कुछ लिखने बैठती थी।मेरे कलम निरन्तर चलते रहते रुकने का नाम ही न लेते।

और आज चलने का न ले रहे।

आखिर फर्क क्या हो गया है आज और कल में

क्यो हो रही है आँखे निश्चल पल -पल में।

क्या मेरी ज़िन्दगी से सारे उद्देश्य ही ख़त्म या फिर जरूरत। (27/11/2019)

Arti Rai

‘लगाव से अलगाव’

जैसे ही हम आगे बढ़ने लगे ।
मेरे चेहरे की मुस्कुराहट अनयास ही गायब हो गयी।

मुझे याद आने लगी वो भीड़ -भाड़ में भी रोड आसानी से क्रॉस करना।

याद आने लगे वो पी -पी की आवाज़ जो हर वक़्त कानों में गूँजती रहती |

मुझे याद आने लगे वो रोड के आ कुत्ते जो रास्ते मे चलते वक़्त सामने आ जाते।

मुझे याद आने लगे वो सांड जो बीच रास्ते मे अक्सर चलते हुए मिल जाते थे जिसको देखकर अक्सर हमलोग बोलते की भोले बाबा घूम के अपनी नगरी का हाल चाल ले रहे हैं।

मुझे याद आने लगे वो ढेर सारे उलझे हुए बिजली के तार।

मुझे याद आने लगी मंदिर की भीड़।

मुझे याद आने लगी वो किलकारियां जो अक्सर हमारे रूम में गूंजती।

मुझे याद आने लगा था वो अपनापन जो अजनबियों के साथ हो गया था।

मुझे याद आने लगी वो आज़ादी जो शायद अब कभी न मिलती।

मुझे याद आने लगा मेरा पसिंदीदा मोमोज।

मुझे याद आने लगा वो तालाब ,जहाँ मुझे सबसे ज्यादे सुकून मिलता।

मुझे याद आने लगा वो भिखारियों का कारवां।

जैसे -जैसे औटो अपनी रफ्तार में बढ़ रहा था मेरी आँखें नम हो रही थीं ।
और मैं धिरे धीरे कैद हो रही थी,उस नज़रिये में।।।।।

जो मुझे अकेले बाजार तक जाने की आज़ादी नही देता।

मैं कैद हो रही थी उस नज़रिये में जो मेरे ट्राली बैग लेकर चलने में मुझे हीरोइन बन ने का तंज देता।

मैं कैद हो रही थी उस नज़रिये में जो मुझे साइड दुप्पटा नही लेने देता

मैं कैद हो रही थी उस नज़रिये में जिसको मेरे खुले बालो से परेशानी होती।

मैं कैद हो रही थी उस नज़रिये में जो मुझे किसी त्योहार प भी सजने सवरने की इजाजत नही देता।

मैं कैद हो रही थी उस नज़ीरिये मे जो मेरे andriod फ़ोन लेने पर ये तंज करता कि ”सुवरे सेनुर गिरगिटे माला।”
( मतलब मैं काबिल नही हु,खूबसूरत नही हूँ इसलिए बड़ा फ़ोन मेरे हाथ मे नही शोभता)

मैं कैद हो रही थी उस नज़ीरिये मे जो मुझे अपने चेहरे को धूल मिट्टी से बचाने की इजाजत तक नही देता।

मैं कैद हो रही थी उस नज़रिये में जहाँ लड़की की शादी स्नातक तक न कर पाने वाले बाप को ताना मारा जाता।

मैं कैद हो रही थी, मैं कैद हो रही थी।,,,,,,,,,,,,,,,
और मेरी नम आंखे आसुओं को समेट न पाए।

वो बारिश की बूदों की तरह बरसने लगे।(Arti Rai)

‘विश्वास की प्रक्रिया’

अपने बारे में—–

हमारे विश्वास की सीमा क्या है?

हमारे विश्वास का आधार क्या है?

हमारे विश्वास का उद्देश्य क्या है?

हमारे विश्वास का परिणाम क्या है?

हमे ये तो नही लगता कि किसी पर विश्वास नही करना चाहिए लेकिन विश्वास में ऐसे उम्मीदें नही पालनी चाहिए जिनकी वजह से कल को पछतावा हो।

विश्वास करो मत उसे समय दो। अगर वो अपने आप बनेगा तो सामने वाले और हमारे रिश्ते में मजबूती के आधार पर बनेगा।
अगर ये विश्वास आकर्षित होकर बना लिए है तो हम हमारे साथ हुए धोखे के खुद ही जिम्मेदार हैं।

कोई भी काम हमे तब करना चहिये जब हम उसके परिणाम को जानते हो।

क्योकि विश्वास हमे सारे पक्षो को नही देखने देता है। और सोचने समझने की शक्ति को कम कर देता है।

विश्वास एक शक्ति है ,लेकिन इस शक्ति को किस तरह उपयोग करते हैं ।ये हम पर निर्भर करता है।

क्योकि अगर ये विश्वास सही जगह उपयोग हुआ तो
हम अपनी मंजिल तक पहुँच जाएंगे और गलत हुआ तो टूट जयेंगे,बिखर जाएंगे,भटक जयेंगे।

किसी पर भी विश्वास करते समय आँखे नही बन्द करनी चाहिए। क्योंकि आंखे श्रद्धा और समर्पण में बंद होती है जो विश्वास के बाद कि प्रक्रिया है।

रंग

उसके मन की तुलना,
उसके चाह की तुलना,
उसके आस की तुलना,
उसके प्यास की तुलना,
, उसके रंग से।
फिर कैसे उतरे वो खरी,किसी की उम्मीदों पे।
जब उसके एहसास की तुलना उसके रंग से।

क्या चाहे वो?क्या पाए वो?
कैसे तुमको बतलाये वो?
वो भी है एक इंसान ही।
फिर क्यों? उसके चाह की तुलना उसके रंग से।
उसके आस की,उसके प्यास की तुलना उसके रंग से।
कुछ खास अंतर नही है उसके रंग में।
बस एक बार तू अपने नज़र के पर्दे को हटा के तो सही।
वही आस,वही प्यास,
वही चाह,वही एहसास,
मिलेगा उसके रंग में,
जो है , तेरे उजले रंग में
फिर क्यों?
उसके आस,प्यास और एहसास की तुलना उसके रंग से।

दोहा-3

जिनके पैरो में फूल,

दुसरो को समझे धूल,

पर इसका मतलब ये नही की

बाकी सब फिजूल।

खुद को न समझो हीन कभी,

क्योकि,

उनके पैरों में फूल

तो तुम किसी बगिया के फूल।

दोहा -2

मिट्टी की किमत वो क्या जाने

जिनको फर्स नसीब

अगर गिरे कभी मुँह के औंधे,

तब समझ आये मिट्टी कैसे चीज

मिट्टी धरती माता

मिट्टी अन्नदाता

फिर काहे मिट्टी से जी घबराता?

दोहा-1

नीच असल मे वही है ,

जो दूसरों को करे तंज,

महानता वाले गुन नही,

खुद को समझे संत,

ऐसे लोगों प ध्यान न दो,

जो करे तुम्हरा अपमान

बस तुम आगे बढ़ते रहो ,

समझ उसको नादान।