‘विश्वास की प्रक्रिया’

अपने बारे में—–

हमारे विश्वास की सीमा क्या है?

हमारे विश्वास का आधार क्या है?

हमारे विश्वास का उद्देश्य क्या है?

हमारे विश्वास का परिणाम क्या है?

हमे ये तो नही लगता कि किसी पर विश्वास नही करना चाहिए लेकिन विश्वास में ऐसे उम्मीदें नही पालनी चाहिए जिनकी वजह से कल को पछतावा हो।

विश्वास करो मत उसे समय दो। अगर वो अपने आप बनेगा तो सामने वाले और हमारे रिश्ते में मजबूती के आधार पर बनेगा।
अगर ये विश्वास आकर्षित होकर बना लिए है तो हम हमारे साथ हुए धोखे के खुद ही जिम्मेदार हैं।

कोई भी काम हमे तब करना चहिये जब हम उसके परिणाम को जानते हो।

क्योकि विश्वास हमे सारे पक्षो को नही देखने देता है। और सोचने समझने की शक्ति को कम कर देता है।

विश्वास एक शक्ति है ,लेकिन इस शक्ति को किस तरह उपयोग करते हैं ।ये हम पर निर्भर करता है।

क्योकि अगर ये विश्वास सही जगह उपयोग हुआ तो
हम अपनी मंजिल तक पहुँच जाएंगे और गलत हुआ तो टूट जयेंगे,बिखर जाएंगे,भटक जयेंगे।

किसी पर भी विश्वास करते समय आँखे नही बन्द करनी चाहिए। क्योंकि आंखे श्रद्धा और समर्पण में बंद होती है जो विश्वास के बाद कि प्रक्रिया है।

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रंग

उसके मन की तुलना,
उसके चाह की तुलना,
उसके आस की तुलना,
उसके प्यास की तुलना,
, उसके रंग से।
फिर कैसे उतरे वो खरी,किसी की उम्मीदों पे।
जब उसके एहसास की तुलना उसके रंग से।

क्या चाहे वो?क्या पाए वो?
कैसे तुमको बतलाये वो?
वो भी है एक इंसान ही।
फिर क्यों? उसके चाह की तुलना उसके रंग से।
उसके आस की,उसके प्यास की तुलना उसके रंग से।
कुछ खास अंतर नही है उसके रंग में।
बस एक बार तू अपने नज़र के पर्दे को हटा के तो सही।
वही आस,वही प्यास,
वही चाह,वही एहसास,
मिलेगा उसके रंग में,
जो है , तेरे उजले रंग में
फिर क्यों?
उसके आस,प्यास और एहसास की तुलना उसके रंग से।

दोहा-3

जिनके पैरो में फूल,

दुसरो को समझे धूल,

पर इसका मतलब ये नही की

बाकी सब फिजूल।

खुद को न समझो हीन कभी,

क्योकि,

उनके पैरों में फूल

तो तुम किसी बगिया के फूल।

दोहा -2

मिट्टी की किमत वो क्या जाने

जिनको फर्स नसीब

अगर गिरे कभी मुँह के औंधे,

तब समझ आये मिट्टी कैसे चीज

मिट्टी धरती माता

मिट्टी अन्नदाता

फिर काहे मिट्टी से जी घबराता?

दोहा-1

नीच असल मे वही है ,

जो दूसरों को करे तंज,

महानता वाले गुन नही,

खुद को समझे संत,

ऐसे लोगों प ध्यान न दो,

जो करे तुम्हरा अपमान

बस तुम आगे बढ़ते रहो ,

समझ उसको नादान।

राहुल-रिया और बारिश

(चित्र-गूगल)

जब बारिश शुरू होती है तो रिया को खुद पे अखितयार ही नही रहता।
बारिश की सुरीली धुने उसको झूमने पर मजबूर कर देती है।
उसके एहसास जागने लगते हैं, वो बारिश की बूंदों स्पर्श करने पर मजबूर हो जाती है।
अजीब सी धुन सवार हो जाती है उसपर ।
बारिश से उसको उतना ही प्रेम है जितना राहुल को रिया से।
एक शाम जो वो कही बाहर जाने के लिए निकली,बीच रास्ते मे ही थी उसी दरमियान काली घटाएं घिरने लगी।
उन काली घटाओं को देख कर रिया के कदम थोड़े
धीमें-धीमे होने लगे।
हल्की हल्की बुन्दाबारी शुरू ही हुई तब तक बिजली की गर्जन उसको कानो को चीरते हुए आगे निकली और वो सिहर गयी।सहसा उसके कदम तेजी से हो गए और उस झोपड़ी की तरफ बढे जिसमे एक बुजुर्ग बाबा समोसा बनाते थे।
सिर पे मखमली दुप्पटा डाले हाथो को छतरी की तरह ताने हुए झोपड़ी ओट तक पहुचती है।
जैसे ही रिया दुप्पटा नीचे कर के नज़रे ऊपर उठती है।उसकी नज़र राहुल के मुस्कुराते हुए चेहरे पर पड़ती है।
वो शरमा जाती है, उसकी नज़र झुक जाती है और वो अपने कदम पीछे करने लगती है और राहुल अपने कदम आगे।

वो मुस्कुराते हुए बोलता है ज्यादे भीगोगी पगली तो नाक बहने लगेगी।
वो न चाहते हुये भी नज़रे उठा के मुस्कुरा देती है और उसके कदम वही ठहर जाते हैं।
उसको मुस्कुराता देख राहुल के एहसास जगने लगते है।
उसके ह्रदय की भावना उसके आंखों में छलकने लगती है।
वो अपने दिल की गाड़ी को आगे बढ़ाना चाहता है। अभी सोचना शुरू करता है कि गाड़ी को कैसे आगे बढ़ाए तब तक कोयल कूकने लगती है और उसे इशारा समझ के राहुल रिया से कहता है,
क्या आप मेरे चाय और समोसे में हिस्सेदार बन सकती हैं।
रिया उस छ मा छ म बारिश की बूंदों को देख कर इतनी मगन थी कि उसने बिना सुने ही हाँ बोल दिया।
हाँ सुन के जैसे ही राहुल उसकी कलाई पकड़ता है वो सिहर जाती है मानो जैसे कड़कती हुई बिजली ने उसे स्पर्श कर लिया हो।
वो शांत हो जाती है उसकी मुस्कुराहट कम हो जाती है वो राहुल के चेहरे को शरारती नज़र से मुस्कुराते हुए देखने लगती है। जब राहुल उसकी आंखो में आंख डाल के देखता है तो वो शरमा जाती है और उसकी नजरें झुक जाती है।
वो हाथ पकड़ रिया को बैंच प बैठाता है।
रिया फिर से राहुल के प्यार से बेखबर हो जाती है, और उसका ध्यान फिर से बारिश की गूँजते आवाज़ की तरह बढ़ जाता है।
राहुल उसे लगातार निहाराता रहता है।
छप्पर से पानी की बूंदे टप-टप कर के दोनों के माथे पे गिरती है।
पानी की बूंदे जब रिया के सिर से मचलते हुए आगे बढते हुए देखता है तो राहुल उस पानी की बूंद को उसके मुंह तक पहुचने से पहले ही उस पानी की बूद उंगली से स्पर्श कर उसे खत्म कर देता।
राहुल निरंतर उसे निहार रहा था और रिया छ मा छ म बारिश को देख कर के मगन हो रही थी।
सहसा जब बिजली कड़की वो सिहर गयी और कस के राहुल को अपनी बाहों में जकड़ ली।
पानी की बौछार उनके ऊपर पड़ के उनके सारे शिकवे गिले को धुल रही थी।
राहुल को प्रेम में पड़ने की इच्छा होने लगी।
अब भी बस उसकी एक ही इच्छा थी वो उन बूंदों को अपने प्रेम का साक्षी बनाना चाहता था।
अजीब सी धुन सवार होने लगी थी राहुल को लेकिन रिया फिर उन बारिश की छम -छम में मगन होने लगी।
सहसा हवा के झोंके ने रिया के दुप्पटे को उससे अलग कर दिया,फिर से उनके जज़्बात उमड़ने लगे।
: राहुल तेजी से दुप्पट्टे के पीछे दौड़ता है और उसे पकड़ लेता है रिया उठ के झोपड़ी से बाहर जाती है राहल उसके दुप्पटे को कंधे पर प्रेम से रखता है,
और एक बार फिर से उनके जज़्बात उमड़ेंगे लगते हैं। बारिश और तेज होने लगी ।रिया पीछे मुड़ती है आगे बढ़ने के लिए तभी राहुल उसका हाथ पकड़ लेता है।
उसका मखमली दुप्पटा फिर से कंधे से गिर जाता है जैसेही रिया झुकती है और उसके झुमका भी गिर जाताहै।
तब तक राहुल दुप्पटा और झुमका दोनो को उठा लेता है। और इस बार दुप्पटे से अपना गिला चेहरा पोछता है। और झुमके को पहनाने े के लिए जैसे ही आगे बढ़ता है रिया आगे बढ़ जाती है।
राहुल वही खड़ा कभी उसे देखता है कभी अपने हाथ मे लिए मखमली दुप्पटे और झुमके को।
रिया जैसे जैसे आगे बढ़ती है उसकी छवि धुंदली पड़ती जाती है।और फिर अचानक वो गायब हो जाती है।

राहुल वही सुन्न खड़ा उस रास्ते को , बारिश की बूंदों को मखमली दुप्पटे को,झुमके को निहारता
बहुत साल बीत गए,बहुते बारिशें आयी पर अब उस बारिश में वो एहसास नही रहे। अब उस बारिश में वो महफ़िल नही रही।
वो बारिश की बूंदे जो हवा के साथ आ के स्पर्श कर रही थी।
अब वो भी थकी सी महसूस हो रही थी।
अब वो बारिश उस दिन की तरह उदार नही होती।
वो मखमली दुप्पट्स,वो झुमका,वो पल सब कल्पना मात्र लगते थे।
ये जानते हुये भी की वो अब नही आ पाएगी राहुल कल्पना करता रहता था।
वो आज भी कहता है कि इस छ मा छ म बारिश को वो ऐसे ही नही जाने देगी वो आएगी वो आएगी ।

उसे महसूस होता है कि वो नई नवेली दुल्हन की तरह सज धज के वो झुमका और दुप्पटा लेने जरूर आएंयी।
आज भी उसको इंतज़ार है अपनी रिया का ।
आज भी इंतज़ार होता है उसे बारिश का।

आज भी इंतज़ार होता है उसे उस पल का।

(आरती राय)

‘सोच रहीं हूँ’

लापरवाह हूँ,फिर भी सोच रही हूँ।

करू कुछ ज़िन्दगी में,

ऐसी तरकीब खोज रहीं हूँ।

लापरवाह हूँ फिर भी सोच रही हूँ।

ये जिंदगी इतनी आसानी से कहाँ कुछ देती

है।

किसी को हँसाती है,किसी को

रुलाती है।

तभी तो मैं अपनी आत्मा को टोक

रही हूँ।

लापहरवाह हूँ फिर भी सोच रही हूँ।

ज़िन्दगी है क्या?अब पता चल रहा है।

इसलिए छोटी -छोटी खुशियों को भी

दबोच रहीं हूँ।

लापहरवाह हूँ, फिर भी सोच रही हूँ।